सोमवार, 6 सितंबर 2010

तुम्हारा........
इतना भर पूछना 
कि खाना खा लिया है तुमने
ऐसा  लगता है
भोर की निशांत किरणों से
नहा गयी हूँ मै ;
मेरे शब्दों की विरलता
और स्वर के उतार चढ़ाव से
जब तुम 
पहचान लेती हो
मेरी मनस्थिति ;
सहसा बन जाता है 
तुम्हारी गोद का वर्तुल
मेरे आसपास 
और तुम्हारी 
हर बात , हर शब्द के साथ 
बज उठता है ह्रदय में
आनंद   का राग ;
तुम्ही से  मेरा विगत 
और भविष्य भी 
तुमसे ही पूरा है 
मेरा इतिवृत्त भी ; 
तुम्हारा देना  
इतना पूरा है कि
न ही कुछ बाकी है 
न ही अधूरा है;
नहीं है सुकून भरी 
किसी वृक्ष की छाया 
तुम्हारे आँचल की छाया से 
सघन और ज्यादा;
हमेशा मेरा
एक तो  घर है 
और वह मेरी माँ का 
ह्रदय भर है.
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