रविवार, 29 अगस्त 2010

हर उलझन को एक प्यास है सुलझ पाउ कैसे ;

हर उलझन  को एक प्यास है 
सुलझ पाउ कैसे ;
विम्बो के धोखो  से 
निकल पाउ कैसे  ;
पर सोचो हर उलझन सुलझ जाएगी तो
होगी नहीं प्यास और
लेखनी में भरे हुए सागर का होगा क्या?


प्रश्नों के भवर अगर 
उठते न होंगे  ;
कुछ  प्रश्न हमेशा 
अनुत्तरित न होंगे  ;
क्योकर  फिर वार्ता कि श्रंखलाये बनेंगी 
कहेंगे -सुनेंगे क्या 
बीच के  हमारे  संवादों का होगा क्या?


कारवा  हो अपना भले ,
मंजिल  भी हो पता ; 
कोई आये पास और; 
रास्ता भी दे बता 
सोचो गर कैनवास सारा रंगीन
यू  मिल जायेगा 
हमें मिली तूलिका का  फिर हम  करेंगे  क्या ?

14 टिप्‍पणियां:

आनन्‍द पाण्‍डेय ने कहा…

ब्‍लागजगत पर आपका स्‍वागत है ।

किसी भी तरह की तकनीकिक जानकारी के लिये अंतरजाल ब्‍लाग के स्‍वामी अंकुर जी,
हिन्‍दी टेक ब्‍लाग के मालिक नवीन जी और ई गुरू राजीव जी से संपर्क करें ।

ब्‍लाग जगत पर संस्‍कृत की कक्ष्‍या चल रही है ।

आप भी सादर आमंत्रित हैं,
http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ पर आकर हमारा मार्गदर्शन करें व अपने
सुझाव दें, और अगर हमारा प्रयास पसंद आये तो हमारे फालोअर बनकर संस्‍कृत के
प्रसार में अपना योगदान दें ।
यदि आप संस्‍कृत में लिख सकते हैं तो आपको इस ब्‍लाग पर लेखन के लिये आमन्त्रित किया जा रहा है ।

हमें ईमेल से संपर्क करें pandey.aaanand@gmail.com पर अपना नाम व पूरा परिचय)

धन्‍यवाद

Surendra Singh Bhamboo ने कहा…

ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

मालीगांव
साया
लक्ष्य

हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

वीना ने कहा…

भाव बहुत अच्छे हैं और विश्लेषण भी अच्छा है
बधाई हो...लेकिन
हर उलझन को एक प्यास है
सुलझ पाउ कैसे ;
विम्बो के धोखो से
निकल पाउ कैसे ;

आप खुद सुलझना चाहती हैं या उलझन को सुलझाना... सुलझाना उलझन को होता है तो..
सुलझा पाऊं कैसे...होना चाहिए..
निकल पाऊं कैसे....बड़ा ऊ होगा...
कारवा नहीं ..कारवां होता है
वर्तनी पर थोड़ा ध्यान दीजिए
क्षमा चाहूंगी...खराब लगा हो तो

यहां भी जरूर आइए

http://veenakesur.blogspot.com/

Shakti Suryavanshi ने कहा…

mujhe kuch bhi nahi kehna hai bus tumne kayal kar diya..

Shakti Suryavanshi ने कहा…

veena ji..
jaha tak mai samjh paya hu..savita ke bhav sahi hai..isko doosre chhor se dekhiye..

uljhan ko pyas hai sulajhne ki..ye hamare vichharo ki udher bun ke baare me hai..
dhanyavaad..

Shakti Suryavanshi ने कहा…

meemansha..samay ke sath sath tumhari gahraiyo ko janna accha ehsas hai..

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर.

अजय कुमार ने कहा…

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

Shah Nawaz ने कहा…

बेहतरीन रचना!

राकेश कौशिक ने कहा…

अच्छे भाव और सुंदर रचना.
विशेष:
"हर उलझन को एक प्यास है
सुलझ पाउ कैसे;
विम्बो के धोखो से
निकल पाउ कैसे;
पर सोचो हर उलझन सुलझ जाएगी तो
होगी नहीं प्यास और
लेखनी में भरे हुए सागर का होगा क्या?"

anurag shukla ने कहा…

great yaar...you got too many comments....you are almost famous...my wishes are always with you.

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर

प्रतुल ने कहा…

........ लेखनी में भरे हुए सागर का होगा क्या?
........ बीच के हमारे संवादों का होगा क्या?
........ हमें मिली तूलिका का फिर हम करेंगे क्या?

@ काफी विचारणीय प्रश्न. और नवीन चिंतन को दिशा देती सोच.
एक सुझाव : फोंट्स को इटेलिक और बोल्ड न करें. आवश्यकता पर ही करें.
कविता सुन्दर हो तब भी टेढ़ी-भुकोली लगती है. अतः कविता की सुन्दरता के साथ न्याय बरतें.

alok ने कहा…

कारवा हो अपना भले ,
मंजिल भी हो पता ;
कोई आये पास और;
रास्ता भी दे बता
सोचो गर कैनवास सारा रंगीन
यू मिल जायेगा
हमें मिली तूलिका का फिर हम करेंगे क्या ?
............... very beautiful lines