रविवार, 29 अगस्त 2010

हर उलझन को एक प्यास है सुलझ पाउ कैसे ;

हर उलझन  को एक प्यास है 
सुलझ पाउ कैसे ;
विम्बो के धोखो  से 
निकल पाउ कैसे  ;
पर सोचो हर उलझन सुलझ जाएगी तो
होगी नहीं प्यास और
लेखनी में भरे हुए सागर का होगा क्या?


प्रश्नों के भवर अगर 
उठते न होंगे  ;
कुछ  प्रश्न हमेशा 
अनुत्तरित न होंगे  ;
क्योकर  फिर वार्ता कि श्रंखलाये बनेंगी 
कहेंगे -सुनेंगे क्या 
बीच के  हमारे  संवादों का होगा क्या?


कारवा  हो अपना भले ,
मंजिल  भी हो पता ; 
कोई आये पास और; 
रास्ता भी दे बता 
सोचो गर कैनवास सारा रंगीन
यू  मिल जायेगा 
हमें मिली तूलिका का  फिर हम  करेंगे  क्या ?

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