सोमवार, 2 अगस्त 2010

कभी- कभी
कुछ भी न लिखना  भी
अच्छा होता है ;
जरूरी तो नहीं
कि
सब कुछ जो
हम कहना चाहे , कहे ही ;
या फिर जो हम कहते है
वो कोई
समझे ही.
दोस्तों!
अधिकतर तो हम कहते रहते है -
लोग सुनते रहते है
फिर एक दिन
पता चलता है
किसी ने कुछ भी तो
नहीं सुना था ;
सुना होता तो आज
यू क्या अकेले होते हम,
इस भीड़ में यू तन्हा
इस कदर  गुमसुम.
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