रविवार, 29 अगस्त 2010

हर उलझन को एक प्यास है सुलझ पाउ कैसे ;

हर उलझन  को एक प्यास है 
सुलझ पाउ कैसे ;
विम्बो के धोखो  से 
निकल पाउ कैसे  ;
पर सोचो हर उलझन सुलझ जाएगी तो
होगी नहीं प्यास और
लेखनी में भरे हुए सागर का होगा क्या?


प्रश्नों के भवर अगर 
उठते न होंगे  ;
कुछ  प्रश्न हमेशा 
अनुत्तरित न होंगे  ;
क्योकर  फिर वार्ता कि श्रंखलाये बनेंगी 
कहेंगे -सुनेंगे क्या 
बीच के  हमारे  संवादों का होगा क्या?


कारवा  हो अपना भले ,
मंजिल  भी हो पता ; 
कोई आये पास और; 
रास्ता भी दे बता 
सोचो गर कैनवास सारा रंगीन
यू  मिल जायेगा 
हमें मिली तूलिका का  फिर हम  करेंगे  क्या ?

शनिवार, 28 अगस्त 2010

I wanna meet you.........even if..........

I wanna  meet you 
through all the paths of my life
always & everywhere;
even if.....
you will be busy in your matters,


I wanna see you
till my eyes open & not blurred,
& an aluring smile on your face;
even if.......
you will not give a single notice to me,


I wanna hear you
for the sake of each your unsaid,
& for hearing your sweet laughter;
even if.....
you might punish me for tresspasssing,


I wanna be with you
& to get hold your hand when ,
the weather will be blustry enough,
even if..........
you will leave me quite unanswered,


I wanna feel you
when you seldom talk with me,
or leave something quite unsaid,
even if.............
you do not give attention to me,


I wanna remember you,
your each colloquy as my heritage,
at all you are charisma to me,
even if..........
you will forget me unreasonably,


I wanna bear you
but can't bear a single drop of tear
 in your eyes,anguish on your face,
even if.............
you might criticize me for such concern towards you.

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

जीवन तपती रेत ,
है चलना इस पर ,लेकिन 
इतना बस बच जाये 
कि लिख सकू एक म्रदुल कविता 
बहुत है मै समझूंगी;


सपनो कि झंझरी को भेदते
तीर कई आयेंगे
और यथार्थ कि कडवी घुट्टी 
पीनी ही होगी
होना है तो हो ये सबकुछ
लेकिन फिर भी रहे सशेस तनिक सहजता
बहुत है मै समझूंगी;


पत्थर होंगे,
काटे होंगे
जगह-जगह पर 
ही रिश्तो को
रिश्तो ने बाटे  होंगे
देखना होगा सबकुछ ये
लेकिन फिर भी 
कही जो देखू
मरण प्रेम का
कसक बड़ी हो
रहे नसों में रक्त उबलता
बहुत है मै समझूंगी;


भले मूल्य है नहीं 
आज मूल्यों का
लेकिन केवल यही जमी है
जिस पर फलती 
और फूलती जाती जीवन बेल
भले समझ न पाए कोई..
फिर भी एक उम्मीद कि धरती स्वर्ग बनेगी
इस उटोपिया कि खातिर 
गर रह जाये कुछ ह्रदय कलपता
बहुत है मै समझूंगी.

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

ये Trigonometry जीवन की
कभी मेरे  कैम्पस  कि शाम सी लगी;
जब जीवन के सारे curve  थे smooth
जब बोलने को पास थे ,कुछ  हसीन झूठ 
ये जिंदगी मुझे आराम सी लगी ;
कभी मेरे कैम्पस की..........................
दोस्ती के circle  जब रहे आसपास 
share किये हमने जब पल कई खास 
जिंदगी मुझे भरे हुए जाम सी लगी ;
कभी मेरे कैम्पस ....................................
मस्ती के functions discontonuous  हुए जब ;
simple linear equations simultaneous हुए तब 
और जिंदगी ये दोपहर के घाम  सी लगी 
कभी मेरे कैम्पस की शाम .........................................
catenary  रही जब तक graphics थे simple;
helix  हुई जब से , सब complex  हुए symble
और जिंदगी तब पाक कि आवाम सी लगी ;
कभी मेरे कैम्पस कि शाम.....................................

शनिवार, 7 अगस्त 2010

मै खुद को ,
खोती जा रही थी...
 फिर एक दिन
लगा मुझे -
मै  हू ही नहीं
और हो तुम
सिर्फ
तुम ही तुम.....
.....और तब से
मै कुछ भी
नहीं कहती हू
पर,
तुम लेते हो -
सब कुछ सुन
मेरा हर रुदन
मेरी हर गुनगुन .

सोमवार, 2 अगस्त 2010

कभी- कभी
कुछ भी न लिखना  भी
अच्छा होता है ;
जरूरी तो नहीं
कि
सब कुछ जो
हम कहना चाहे , कहे ही ;
या फिर जो हम कहते है
वो कोई
समझे ही.
दोस्तों!
अधिकतर तो हम कहते रहते है -
लोग सुनते रहते है
फिर एक दिन
पता चलता है
किसी ने कुछ भी तो
नहीं सुना था ;
सुना होता तो आज
यू क्या अकेले होते हम,
इस भीड़ में यू तन्हा
इस कदर  गुमसुम.