मंगलवार, 27 जुलाई 2010

मै जरा सा इंतजार और करना चाहती हू ;
जिन उड़ानों के लिए है
स्वप्न मेरे ;
मै उन्ही के लिए दो पल
को ठहरना चाहती  हू ; मै जरा सा .......
ख्यालो का हुनर लेकर
गढ़ सकू कुछ खूबसूरत
कर सकू ये पूर्ण वादा
इसलिए कुछ और वादों से मुकरना चाहती हू ; मै जरा सा ......
तपन के ही बाद
होता है खरा कुछ
हो सके  कुछ खरा सोना
इसलिए मै जिंदगी की आग से होकर गुजरना चाहती हू ; मै जरा सा ....

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

इतना बुलबुलों का
शौक क्यों है मुझे:
मै जबकि
जानती हू -
फूट जाना है इन्हें ,
अक्सर 
मनाती    हू
उन्ही रुस्वाइयो  को क्यों
एक दिन कुछ
गिले देकर
रूठ जाना है जिन्हें;
इंतजार
क्यों किया करती हू
मै उस नमी का
ओस की माफिक
सुबह हर
सूख जाना है जिन्हें ;
एक सा लगता है
मुझको हर समां अब 
कौन बेगाने
मेरे है
कह सकू अपने किन्हें .











शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

तुम मुझे
कभी समझ नहीं आये ,
मैंने  समझ की 
मिटटी से ,
तुम्हारे लिए 
कई साचे
बनाये ,
पर
आगे बढ़ जाते हो 
तुम 
मेरे हर  साचे को 
बिना ठुकराए 
फूल पर पत्तियों की तरह ढके रहे तुम 
फूल दिन भर गुनता है तुम्हारी गुनगुन 
फिर  क्यों 
मेरे हर रोने पर
 तुम  मुस्कुराये ,
तुम मुझे कभी समझ नहीं आये .
इतना भीग जाने से
हमेशा बचना
की सुखा न सको,
 अपने वसन ,
क्योंकि मौसम हमेशा
एक जैसा नहीं
रहता
और
 साबुत नहीं रहते
हमेशा दर्पण .