गुरुवार, 11 मार्च 2010

आज फिर से आसमा को
अंक भरना चाहती हू
घटा बनकर नेह की
जी भर बरसना चाहती हू;

खो गए है स्वप्न सारे
थे मुझे जो बड़े प्यारे ,
आज फिर सब साथ लेकर ,
जिन्दगी की आग पर से
चुटकियो में गुनगुनाकर
बस निकलना चाहती हू, आज फिर से ......
कौन यू ही मुस्कराए
क्षत विक्षत है कल्पनाये
आज फिर से मुस्कुराकर
उमंगो की अल्पना में
कल्पना की तूलिका से
रंग भरना चाहती हू , आज फिर से .........
स्नेह के सब स्रोत सूखे
खाइंया है आस्था में
विस्वास की एक डोर तो
रह जाए नम ,मै इसलिए
नेह की एक नदी बनकर
सतत बहना चाहती हू, आज फिर से ......


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