बुधवार, 24 मार्च 2010

इतना भी शबनम

ये लम्हे

नहीं होते

शब् में जो बरसे

और सुबह खो जाए;

इतना न नम रखो

यादो के बादल को

हर अनकही को जो

आंसू बन धो जाए ;

जिन्दगी की चाही -

अनचाही राहो पर

पाया भी , खोया भी

मुस्काई , रोया भी ;

इतनी तो क्षणभंगुर

नहीं होती मुस्काने

दूर कोई जाए

और ये

चुपके से रो जाए ।

सोमवार, 15 मार्च 2010

किसी का कुछ भी

अपना नहीं होता

अगर होता तो

यू ही क्यों खोता ;

ये क्षण

कितने रेत है

फिसल जाते है

जिन्दगी की मुट्ठी से

और

यादो के कुछ कण

चिपके रह जाते है

एक

जिद्दी बच्चे की

ख्वाहिशो की तरह

मन की हथेली पर ;

कई मौसमो के बाद

फिर किसी को

याद नहीं रहता

भावना के कुछ बदल

कब , कहा बरसे

हर पतझड़ के बाद

आ ही जाता है

बसंत ,

और लोग कहते है -

जी लेंगे फिर -फिर से ।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

आज फिर से आसमा को
अंक भरना चाहती हू
घटा बनकर नेह की
जी भर बरसना चाहती हू;

खो गए है स्वप्न सारे
थे मुझे जो बड़े प्यारे ,
आज फिर सब साथ लेकर ,
जिन्दगी की आग पर से
चुटकियो में गुनगुनाकर
बस निकलना चाहती हू, आज फिर से ......
कौन यू ही मुस्कराए
क्षत विक्षत है कल्पनाये
आज फिर से मुस्कुराकर
उमंगो की अल्पना में
कल्पना की तूलिका से
रंग भरना चाहती हू , आज फिर से .........
स्नेह के सब स्रोत सूखे
खाइंया है आस्था में
विस्वास की एक डोर तो
रह जाए नम ,मै इसलिए
नेह की एक नदी बनकर
सतत बहना चाहती हू, आज फिर से ......


मंगलवार, 9 मार्च 2010

एक हाथ में
तितली और एक में लेकर फूल ;
मै खुश हो गयी
और भूल गयी
हर चुभता हुआ शूल ;
बटोर कर रख ली
रत्ती भर चन्दन के साथ
मुट्ठी भर धूल;
पर,
क्या पता था मुझे
तितली उड़ जाएगी
फूल मुरझा जायेगा
चन्दन झरजायेगा,
और मेरे हिस्से रह जाएगी
सिर्फ धूल,
खाली हथेली
और एक सूखा फूल ..

शुक्रवार, 5 मार्च 2010


एक कशमकश के बाद का हालेसुकू जैसे ,
चाहकर जो चल भी दू , और न रुकू जैसे ;

समय की पगडंडियो पर ,
शबनमो को बांधकर,
लबों पर यूं खिलखिलाहट
के तराने साधकर ,
कौन हो तुम आ गए हो सुरमई शय से ;
देखती हूँ आसमा को
सोचती हूँ भानकर ,
जानती हूँ तुम्हे कैसे
न मै कुछ भी जानकर ,
कल्पना है या है सच , मै कह सकू कैसे ;
फासले भी हो अगर
तो दिलनशी हो ,
वक़्त कुछ ऐसे
हमारा हर हंसी हो ,
मुस्कराहट के मुकुल हो खिल गए जैसे;

कैनवासो पर उकेरी
जिन्दगी की हरअदा
आज शायद जुड़ी उसमे
दोस्ती की एक सदा ,
ये गीत लिखना है मुझे विस्वास की लय से ;

maa मेरे जीवन का,
तुम ही हो सबसे मधुरिम संगीत ;

तुम न कहोगी ,
तो भी हार जाउंगी ,
हर उस जगहपर
जंहा होगी तेरी जीत ; माँ ..........

तुम्हारा इतना भर पूछना
कि खाना खा लिया है तुमने
भर देता है मुझे भावना की बूंदों से
कोरो में स्नेह लगता है जमने

जीवन का हर वो क्षण प्यारा है मुझे
जिसमे है तेरी ममता अभिनीत; माँ ..........

माँ तुम्हारा देना इतना पूरा है कि
ना ही कुछ बाकी और ना ही अधूरा है
चाहती हूँ इतना स्नेह लुटाना की ,
भर सकू तेरे प्रेम से अपना खजाना

तुम मेरा आगत तुम ही इतिवृत्तभी
तुमसे ही पूरा है मेरा हर गीत ; माँ .........

कितना भी विस्तृत हो ,
पीढियो का अन्तराल
रुचिकर न लगे भले
परम्परावो का जाल ,

पर एक संकेत भी तेरा जो होगा माँ
पोषित करुँगी मै तेरी हर रीत ; माँ .........

गुरुवार, 4 मार्च 2010


हथेली जब छोटी हो ,
और बहुत कुछ हो समेटने को ,
पलके जब बोझिल हो '
और बहुत कुछ हो सोचने को,
दिल का आसमान पूरा खुल जाने दो ,
नेह की बूंदों को बादल बन छाने दो ,
सिमटने दो पलकों पर बिता हुआ दुःख कोई,
और किसी अपने पर उसे बरस जाने दो ,
देखोगे ,
उडती हुई मुस्कुराहट की तितलियों को ,
अपने बहुत पास ,
फूल सा खिला होगा अपनों के अपनेपन का,
मासूम सा उजास .





बुधवार, 3 मार्च 2010

दो बूंदे

दो बूंदे ;
क्या क्या कह जांए ?
सींचा जिन्हें प्रेमघट लेकर
जिन बेलों को सौरभ देकर
वही लिपटकर तन पर यदि
गरल भरा विषधर बन जाये, दो बूंदे ......

जीवन को अम्बर सा देखा
खवाबो सी तारो की रेखा ,
वो ही सितारे खुद से प्यारे ,
यदि अब अनचाहे बन जाये , दो बूंदे....
स्वप्नों की झंझरी के नीचे
पीछे पीछे आँखे मीचे
जिनकी खातिर चलती आई ,
यदि यूं बेगाने बन जाये , दो बूंदे....