सोमवार, 6 दिसंबर 2010

"I dont care!"

तुमने मुझे 
कुएं से निकलने में मदद की ,
गुनगुनी धूप में रखा मुझे 
पंख सूख गये मेरे 
अब थोड़ा -थोड़ा
उड़ने लगी हूँ मै;


उस कोने से
कम दिखता था आसमान, 
तुमने मुझे पुचकारा 
मै दो कदम आगे आई 
मेरी खिड़की थोड़ी बड़ी हो गयी 
अब उस पर
फुदकने लगी हूँ मै;


मै बहुत फूल थी 
और डरती थी कांटो से 
तुमने कहा -
काँटों से मत डरो
पल्लवों को सख्त करो
तुम्हारी भी है सुबह-शाम 
अब सबोरोज़ बिखरने- 
सिमटने लगी हूँ मै ;


मै सीखती जा रही हूँ 
किसी भी मुंडेर पर बैठ जाना 
बालकनी के बाहर भी 
दुनिया का होना 
जान रही हूँ मै ,
तुम्हारा आग्रह था या हठ
नहीं जानती, पर अब 
सूरज की तरह 
खुद के पर्वतों से 
निकलने लगी हूँ मै;


दोस्त! वो तुम्हारी ही 
धूप थी 
कि अब 
डर नहीं लगता है 
कि फिर क्या होगा 
और बेवजह भी 
बर्फ की मानिंद 
पिघलने लगी हूँ मै;
और .....................
फिर भी तुम कहते रहते हो-
"I dont care !"

गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

चल, जिंदगी में लौट चल ....

जहाँ से 
जिंदगी को छोड़ा था 
चलकर वहीँ पर 
हाथ उसका पकड़ ले , क्या पता कब आये कल;
चल , जिंदगी में लौट चल...


जामुनी वे 
स्वप्न , मीठी हर शरारत 
छोड़ आये हैं जहाँ पर 
शोख नटखटपन और ख़ुशी के म्रदु पल ;
चल, जिंदगी में लौट चल ....


ये जिंदगी एक 
डोर , जिसमे पतंग 
अपनी ख्वाहिशें ,
बस कसकती है हवा कि बेरुखी कि गल;
चल , जिंदगी में लौट चल...


भले ही
शोर  लगता हो किसी को 
तटों पर मौजों का गिरना 
मगर एक निर्वाक से, ये प्रिय मुझे हलचल;
चल, जिंदगी में लौट चल.....

और मै कहना नहीं चाहती!

मै नहीं कहती,
कि छलांग  लगा दो
मेरी धार में....
पर....
मेरा ,
बहना तो देखो!


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असम्भव नहीं है रे!
कहा उसने -'प्रेम';
वह बस
बोली -"मुश्किल तो है न प्रिये!"


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तुम मेरा
खोना
देखते रहोगे , और
बोलोगे तक नहीं .....
पर मेरे जाने के बाद
मेरे लिए
तुम्हारी एक सिसकी पर
बिलख उठूंगी मै.......


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तुम्हारी
मासूमियत पर शक नहीं,
शिकवा नहीं तुमसे मुझे
बस
ये समय का जख्म है
कि तुम
महसूस नहीं
कर सकते
और मै कहना नहीं चाहती!


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मेरी सीली यादो में
एकमात्र
नम लम्हा
तुम हो....
बस याद नहीं पड़ता है
कब, कहाँ भीगी थी??


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अब मै
पतंग नहीं रही
पर वो हैं  कि
डोर ही नहीं छोड़ते हैं ....


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ख़ामोशी का उसे
इतना हुनर क्यों है,
मासूम  मिजाजी का
 वो फनकार है क्योकर ,
HMm!!
वो कुदरत के ,
इत्मिनान की तस्दीक है,
उसे मोहब्बतों में रखना खुदा मेरे ,
गिला करुँगी वर्ना-
 उसकी पलके क्यों
 भीगी हैं ,नमी है
आखों में क्योकर.......


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पल - पल 
खो जायेगा ,
पर मै बचा लूंगी
लम्हें -लम्हें,
कतरे-कतरे 
स्मृतियों के ,
याद रखूंगी 
अभी घट रहे 
सारे मुक्तक ,
और फिर-फिर से लिखूंगी 
नयी विधा में पुरानी नज्में .


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कितना भी दे दोगे 
कम ही लगेगा..
रिश्तें हों नेह पगे 
तो  यही बस लगता है
दिया है -
'सबकुछ' के लिए 'कुछ नहीं'....

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

'एक वही बूँद ही बरसता नहीं'

एक गह्वर है ,जो भरता नहीं ;
सिमटकर लम्हे
मेरी मुट्ठी में है 
और रेत के माफिक 
फिसल रहे हैं 
सच है ,
वक़्त कभी ठहरता नहीं ;
एक गह्वर है ,जो भरता नहीं ;


विवशता की कंदीलों में 
साफ दिखते है
जिंदगी के चाँद पर धब्बे 
दिन छुपा देता है सबकुछ 
पर कभी कुछ निखरता नहीं ;
एक गह्वर है ,जो भरता नहीं ;

कसक है बस इतनी 
की असंख्य बारिशें  हो जाती हैं 
सावन में , पर सीप 
जिस बूँद की प्रतीक्षा में होती है 
एक वही बूँद ही बरसता नहीं;
एक गह्वर है ,जो भरता नहीं ......

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

मै पूछना चाहती हू दोस्तों !

मै पूछना चाहती हू दोस्तों !
क्यों इस कदर और इस हद तक 
हँसाते हो मुझे,
गर कभी रोना पड़ा तो
 क्या करुँगी .......................
आज की ये हकीक़त  है
 बहुत प्यारी 
फ़साना पर जब बनेगी
नहीं होगे पास तुम सब 
और फिर ये जिंदगी 
लम्बी लगेगी 
क्या करुँगी.....................


 चमन सी है जिंदगी 
गुलजार अपना वक़्त है
मोहब्बत है, बिलावजह के कभी झगडे
और फिर नाराजगी
सोचती हूँ
फिर कभी जब बिन वजह ही 
झगड़ने का 
मन करेगा 
क्या करुँगी ..........


प्रीत के बंधन अभी है 
एक दिन पर सब अलग हो जायेंगे 
फिर कहा पर भला किसको पाएंगे
मसरूफ होंगे सभी 
अपने फसानों में 


वक़्त की फिरकी 
मगर जब भी चलेगी
याद आओगे बहुत सब 
क्या करुँगी...............

To my dear friends!!

" mai poochhna chahti hu dosto!
kyo is kadar ,
aur is had taq hasate ho mujhe
gar kabhi rona pada ,
to kya karungi ;

aaj ki ye haqiqut hai
bahut pyari,
fasana par jab banegi,
nahi hoge pas tum sab
aur fir 
ye jindagi lambi lagegi...
kya karungi............

chaman si hai jindagi , 
guljar apna vaqt hai
mohabbat hai, bilavajah ke kabhi jhagde
aur fir narajgi
sochti hu , fir kabhi jab
bin vajah hi
jhagadne ka 
man karega,
kya karungi........

preet ke bandhan abhi hai
ek din par 
sab alag ho jayenge
fir kaha par bhala kisko payenge,
mashroof honge sabhi 
apne fasano me;

vaqt ki firki magar
jab bhi chalegi , 
yaad aaoge bahut sab 
kya karungi................"

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

जिनके लिए झगड़ रहे हो मेरे दोस्तों!

कोई हिन्दू तो कोई मुसलमान क्यों है
मंदिर-मस्जिद के लिए सब इतना परेशान क्यों है 


जिनके लिए झगड़ रहे हो मेरे दोस्तों!
वो रहते हैं  सिर्फ मोहब्बत भरे दिलो में 
क्योंकर होगी जरुरत, उन्हें किसी घर की,
लोग इस हकीकत से अंजान क्यों है...


.
दो-चार पल की जिंदगी में शिकन क्यों रुसवाई क्यों ,
प्रेम की तस्वीर पर ये घ्रणा की परछाई क्यों 
सिमटते और एक परिवार होते इस जहाँ में,
आज भी हम कदर  नादान क्यों है..... 

शनिवार, 25 सितंबर 2010

"तुम बादल की तरह ,
छा जाओ अगर .....
मै बरसना चाहूंगी ,
रिमझिम- रिमझिम......


तुम्हारी धूप के सिर्फ 
एक टुकड़े के लिए ,
रहता है ये भीगा  मौसम
गुमसुम-गुमसुम.........


हर खोते हुए लम्हे में 
तुम्हारे होने की तितली है,
और तितलियों के बगैर है 
व्यर्थ भ्रमरों की गुनगुन ."


मै बहकी सी कह रही थी ,
वक़्त ने मुझको झिंझोड़ा ,
और बस इतना कहा-
ओ मेरी पगली सुन-...


क्यों तुझे समझ नहीं 
आता है- बाज़ार है दुनिया 
बेमोल है यहाँ ख्वाबो की कदमताल 
और नेह की हर एक धुन.

शनिवार, 11 सितंबर 2010

मै कही , दूर चली आई हूँ -लगता है ,

मै कही दूर ,
चली आई हूँ-लगता है;
मै अपने ही किसी
कल की तन्हाई हूँ-लगता है;


एक सपने में हूँ  ,
खुश्क हकीक़त से डर लगता है ,
मै अपने खोये हुए ,
वक़्त क़ी भरपाई हूँ -लगता है;


मुझे अफ़सोस नहीं,क्योकर चली धूप में थी
उस दुशवार धूप में बनी थी 
जो मेरे संग-संग
मै वही परछाई हूँ - लगता है;


मेरा साकी , 
मेरे मयखाने में ही मेरा नहीं ,
जिंदगी का जाम पिए 
दिलो क़ी नरमाई हूँ- लगता है ;


किसी महफ़िल का 
तराना बनूँ,सोचा न था ;
आज पर दिलों के
दरवाजे क़ी शहनाई हूँ - लगता है;


प्रिय है मुझे बसंत ,
तितलियाँ,फूल बड़े प्यारे है;
मै उनकी सासों में 
घुलीमिली पुरवाई हूँ - लगता है;


अगर मै जिंदगी 
कहूं खुद को,ऐ खुदा;
मौत के जंगलो में
किस-कदर भरमाई हूँ - लगता है ;


तमाम उम्र हुई ,  
अजनबी हूँ , मै खुद से ;
ऐ  जिंदगी - न तुझको ,
न ही खुद को,समझ पाई हूँ-लगता है  .

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

क्यों मानू मै ,

क्यों मानू मै ,
नियति रुदन को ,
मेरे भी कुछ अरमा- सपने ;

नहीं चाहिए 
भ्रमित सहारे 
सब पहचाने कितने - अपने;

मुझसे प्रश्न 
करे हर कोई 
मै भी चाहू उत्तर अपने ;

तुम कहते हो 
रक्षा खातिर मेरी 
खीच रहे सीमाए ;

कैसे  मानू 
सत्य यही है ,
इसीलिए लक्ष्मण-रेखाए ;

मुझे आश्रय दिया सभी ने  
पर क्यों न मेरा घर कोई ;
यह न मेरा ,
वह न मेरा ,

यहाँ ' पराई'
वहा  'दूसरे घर' से आई ;

एक रेत कि नदी बनी मै ;
क्यों पग-पग पर 
ठोकर खाऊ ,
युगों -युगों से मौन रही मै 

क्यों अब भी मै चुप रह जाऊ ;

सोमवार, 6 सितंबर 2010

meemaansha

meemaansha
तुम्हारा........
इतना भर पूछना 
कि खाना खा लिया है तुमने
ऐसा  लगता है
भोर की निशांत किरणों से
नहा गयी हूँ मै ;
मेरे शब्दों की विरलता
और स्वर के उतार चढ़ाव से
जब तुम 
पहचान लेती हो
मेरी मनस्थिति ;
सहसा बन जाता है 
तुम्हारी गोद का वर्तुल
मेरे आसपास 
और तुम्हारी 
हर बात , हर शब्द के साथ 
बज उठता है ह्रदय में
आनंद   का राग ;
तुम्ही से  मेरा विगत 
और भविष्य भी 
तुमसे ही पूरा है 
मेरा इतिवृत्त भी ; 
तुम्हारा देना  
इतना पूरा है कि
न ही कुछ बाकी है 
न ही अधूरा है;
नहीं है सुकून भरी 
किसी वृक्ष की छाया 
तुम्हारे आँचल की छाया से 
सघन और ज्यादा;
हमेशा मेरा
एक तो  घर है 
और वह मेरी माँ का 
ह्रदय भर है.

रविवार, 5 सितंबर 2010

संसार की  संभावना की  रीत हूँ मै 
मीत ! तुमसे ही तुम्हारी जीत  हूँ मै;


बढ़ चली मै अलक्ष पथ पर 
ले हथेली पर नीहारे ,
नीव के मोती बने जो 
उन्ही स्वप्नों का मधुर संगीत हूँ मै; ....मीत! तुमसे ही ........


सभ्यता की सकल डगमग 
संस्कृति की सब कतारे
टिकी जिस पर है अहर्निश 
कल्प्कल्पो से कड़ी वह भीत हूँ मै ;....मीत! तुमसे ही ..........


टके जिस इतिवृत्त पर 
धैर्य , करुणा के सितारे 
जो अनंत , अनित्य , अद्भुत 
उस कथा के आदि का अभिनीत हूँ मै ;......मीत!  तुमसे ही ........


ह्रदय के तपते अधर पर 
पड़ी जो शीतल फुहारे 
कामना जिसकी सतत की
तेरी ही वरदायिनी वह प्रीत हूँ मै ;........मीत ! तुमसे ही ................


उपेक्षित , उद्विग्न हो मै 
शरद की लेकर बयारे 
फिर करती हू अवनि में 
ओह! कम्पित गात में ठिठुरती हुई शीत हूँ मै;....मीत! तुमसे ही ......


 .

गुरुवार, 2 सितंबर 2010


अपने समय को 
बदल देना चाहती हू 
मिली सेकंड्स में ,
और जीना चाहती हू 
हर एक मिली सेकंड .....
क्योकि  क्या भरोसा है 
समय का ;
कि  कौन , कब 
दूर चला जाये
और फिर बहुत याद आये;
अफ़सोस नहीं करना चाहती हू 
कभी कि काश 
दो पल और मिल जाते 
और ....
उन अपनों के साथ 
उस घडी में 
थोडा और रह पाते; 
ये क्षण

बस  रेत है-
फिसल जाते है
जिन्दगी की मुट्ठी से
सिर्फ 
यादो के कुछ कण
चिपके रह जाते है
एक
जिद्दी बच्चे की
ख्वाहिशो की तरह
मन की हथेली पर ;
कई मौसमो के बाद
फिर याद आते है
वे खिलखिलाहटो के
बसंत
झगड़ो का शिशिर
और तू-तू , मै -मै की
सारी बरसाते ,
और फिर
बस यही लगता है -
"जिंदगी के सफ़र मे
 गुजर जाते है जो मुकाम
वो फिर नहीं आते ,
....फिर नहीं आते "