मंगलवार, 10 जुलाई 2018

Online Diaries - 01

यही सुकून है मेरे लिए, यही तलाश और तलाश की मंजिल भी।
लिखने के लिए सबसे पहली शर्त है आलोचना से बचने की कोशिश से मुक्त होना।  
ये मुक्ति ही लिखने की दुनिया का पहला सबक है। 
इस सबक के साथ एक शुरुआत है ऑनलाइन डायरीज।
मुझे नहीं पता कि मुझे क्या लिखना है।  
कौन सा दिन कौन से अनुभवों और किस सबक के साथ ख़तम होगा।
शायद यही जिंदगी के बारे में भी कहा जा सकता है।
तफ़सीले वाक़यात तो नहीं लेकिन अपने जर्फ़ भर अपनी नज़्मे, कहानियां, और अपने शिकवे।


ये सपने, 
जो कहीं दूर से
लेने आ गए थे पनाह
सपनीली आँखों में,
कसमसाते हैं अब
जैसे मछलियां अक़्वेरियम में।

सागर पर पहरे हैं

सागर पर पहरे हैं,

सरिताएं आएंगीं 
अब
कहाँ जायेंगीं,
हर एक मुहाने पर
डेल्टा कुछ ठहरे हैं,

किससे मांगेंगी मदद 
अपने में सभी व्यस्त 
किस पर भरोसा करें 
चेहरे पर चेहरे हैं,

न गर्वित,
न कम्पित हैं 
शांत मंद मंथर ये, 
पत्थरों से जूझने के
जख्म बड़े गहरे हैं,

जीवन की संध्या पर
आश्रय का खोना भर
होता है कष्टप्रद,  
थकी मांदी लहरे हैं;

मुतमइन हैं कि 
आज बंधन हैं, दायरे हैं 
आगत अनिश्चित
पर स्वप्न तो सुनहरे हैं.


(मेरी पुरानी कविताओं में से एक )

रविवार, 27 दिसंबर 2015

"विलोम शब्द"



तुम नहीं थे, 
मैं नहीं जानती थी ख़ुशी,
पर अब,
कभी तुम्हारे न होने से,
जानती हूँ 
ख़ुशी के बिना
कुछ लम्हें;

तुम्हारे बिना 
मैं नहीं जानती थी 
'अकेलापन' 
पर तुम्हारे संग,
जानती हूँ 
कि इसका होना भी है;

रोती थी मैं जब कभी,
चुपके से, 
किसी तकिये पर
रख लेती थी सर,  
तुम नहीं थे जब,
तुम हो तो भी
रोती हूँ मैं, 
पर अब,
कमी महसूस होती है
किसी कंधे की सिरहाने;

विश्वास के मायने,
मैं जानती न थी
तुमसे पहले, 
पर तुम आ गए,
तो जानती हूँ 
अविश्वास का दुःख; 

जिंदगी के अर्थ,
यूँ तो कभी खोजे नहीं,
तुमसे पहले 
ज़िंदगी को सोचा न था, 
तुम आ गए तो अब 
ढूँढ़ती हूँ तुम्हारे बिना 
है जिंदगी कहाँ;

कितना और क्या होता है 
सम्पूर्ण होना,  
नहीं जानती थी मैं 
तुम्हारे आने से पहले, 
पर अब,
तुम्हारे चले जाने को 
कहती हूँ खालीपन;

मेरे,
कुछ शब्दों के अर्थ,
कभी मिले नहीं मुझे, 
और अब जो मिले,
वो हैं बस, 
उनके
'विलोम शब्द'।







रविवार, 20 दिसंबर 2015

'ब्याहता' और 'दहेज़'

    'ब्याहता'

मेरे लिए, 
फूल 
फूल नहीं है,
एक सपनीली लड़की की
निर्भार हँसी है,  
और... 
इसी तरह
जलता हुआ चूल्हा,
उठता हुआ धुँआ,
केवल धुआँ नहीं है, 
एक ब्याहता लड़की के,
सपनों का अलाव 
और जिंदगी का  हश्र है। 

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    'दहेज़' 

गाँठ भर गहनों, 
मांग भर सिन्दूर ,
हाथ भर चूड़ियों, 
और कुछ
सुन्दर कपड़ों के बदले, 
खरीद लिया तुमने मुझे,
और फिर... 
चुपके से मांग लिया 
मेरे पिछले रखवालों से 
मेरी
ताजिंदगी रखवाली का 'किराया' ;
यह सब देखकर 
मेरा हँसता हुआ चेहरा 
फ़क पड़ गया, 
और गाता  हुआ गला 
 भर आया। 




(2008  में लिखी मेरी कविताओं में से)

रविवार, 13 दिसंबर 2015

"इसे,ये मीठा शहद, और है तीखी मिर्ची"

ये पूरे की मांग नहीं है,
न ही अधूरेपन की,
खलिश है,
न ही प्रार्थना,
न ही विनय है,


ये स्वाभाविक,
लेने-देने की रस्में हैं, 
होती ही हैं,
प्रीत अगर हो,
रीत नहीं फिर, 
कभी बांधती, 
ये बंधन फिर,
बंधते नहीं हैं, 
ले लेते हैं अंकपाश में, 
बड़े प्यार से,
मानोगे तो,
एक विश्वास भरी थपकी ने,
जग जीते हैं, 
माँ की हो या हो प्रियतम की, 
प्रेम नहीं कुछ फ़र्क़ माँगता, 
प्रेम अगर हो,
ये पानी सा,
तुम पर निर्भर, 
क्या आकार,
किसे देते हो, 

देते हो तो मिलता ही है, 
नहीं मगर ये 
'लेना -देना' 
किसी गणित का,
यहाँ चाँद  से भी बतियाते ,
पवन से हैं संदेशे जाते,
तुम्हें पता है?
नहीं पहेली, 
ये रहस्य है, 
हो जो जानना,
जीकर देखो, 
चखकर देखो,
पीकर देखो,
इसे, 
ये मीठा शहद,
और है तीखी मिर्ची।
    



ख़लिश= चुभन, पीड़ा