रविवार, 27 दिसंबर 2015

"विलोम शब्द"



तुम नहीं थे, 
मैं नहीं जानती थी ख़ुशी,
पर अब,
कभी तुम्हारे न होने से,
जानती हूँ 
ख़ुशी के बिना
कुछ लम्हें;

तुम्हारे बिना 
मैं नहीं जानती थी 
'अकेलापन' 
पर तुम्हारे संग,
जानती हूँ 
कि इसका होना भी है;

रोती थी मैं जब कभी,
चुपके से, 
किसी तकिये पर
रख लेती थी सर,  
तुम नहीं थे जब,
तुम हो तो भी
रोती हूँ मैं, 
पर अब,
कमी महसूस होती है
किसी कंधे की सिरहाने;

विश्वास के मायने,
मैं जानती न थी
तुमसे पहले, 
पर तुम आ गए,
तो जानती हूँ 
अविश्वास का दुःख; 

जिंदगी के अर्थ,
यूँ तो कभी खोजे नहीं,
तुमसे पहले 
ज़िंदगी को सोचा न था, 
तुम आ गए तो अब 
ढूँढ़ती हूँ तुम्हारे बिना 
है जिंदगी कहाँ;

कितना और क्या होता है 
सम्पूर्ण होना,  
नहीं जानती थी मैं 
तुम्हारे आने से पहले, 
पर अब,
तुम्हारे चले जाने को 
कहती हूँ खालीपन;

मेरे,
कुछ शब्दों के अर्थ,
कभी मिले नहीं मुझे, 
और अब जो मिले,
वो हैं बस, 
उनके
'विलोम शब्द'।







रविवार, 20 दिसंबर 2015

'ब्याहता' और 'दहेज़'

    'ब्याहता'

मेरे लिए, 
फूल 
फूल नहीं है,
एक सपनीली लड़की की
निर्भार हँसी है,  
और... 
इसी तरह
जलता हुआ चूल्हा,
उठता हुआ धुँआ,
केवल धुआँ नहीं है, 
एक ब्याहता लड़की के,
सपनों का अलाव 
और जिंदगी का  हश्र है। 

**********************

    'दहेज़' 

गाँठ भर गहनों, 
मांग भर सिन्दूर ,
हाथ भर चूड़ियों, 
और कुछ
सुन्दर कपड़ों के बदले, 
खरीद लिया तुमने मुझे,
और फिर... 
चुपके से मांग लिया 
मेरे पिछले रखवालों से 
मेरी
ताजिंदगी रखवाली का 'किराया' ;
यह सब देखकर 
मेरा हँसता हुआ चेहरा 
फ़क पड़ गया, 
और गाता  हुआ गला 
 भर आया। 




(2008  में लिखी मेरी कविताओं में से)

रविवार, 13 दिसंबर 2015

"इसे,ये मीठा शहद, और है तीखी मिर्ची"

ये पूरे की मांग नहीं है,
न ही अधूरेपन की,
खलिश है,
न ही प्रार्थना,
न ही विनय है,


ये स्वाभाविक,
लेने-देने की रस्में हैं, 
होती ही हैं,
प्रीत अगर हो,
रीत नहीं फिर, 
कभी बांधती, 
ये बंधन फिर,
बंधते नहीं हैं, 
ले लेते हैं अंकपाश में, 
बड़े प्यार से,
मानोगे तो,
एक विश्वास भरी थपकी ने,
जग जीते हैं, 
माँ की हो या हो प्रियतम की, 
प्रेम नहीं कुछ फ़र्क़ माँगता, 
प्रेम अगर हो,
ये पानी सा,
तुम पर निर्भर, 
क्या आकार,
किसे देते हो, 

देते हो तो मिलता ही है, 
नहीं मगर ये 
'लेना -देना' 
किसी गणित का,
यहाँ चाँद  से भी बतियाते ,
पवन से हैं संदेशे जाते,
तुम्हें पता है?
नहीं पहेली, 
ये रहस्य है, 
हो जो जानना,
जीकर देखो, 
चखकर देखो,
पीकर देखो,
इसे, 
ये मीठा शहद,
और है तीखी मिर्ची।
    



ख़लिश= चुभन, पीड़ा


रविवार, 6 दिसंबर 2015

" सपनों की क्या बात करें"



सपनों की क्या बात करें...

जो मिला नियति से,
उसको लें हथियार बना, 
अवनति से,
दो दो हाथ करें, 
सपनों की क्या बात करें...

जो चलते है तलवारों पर, 
उनको असिधारों से क्या डर, 
कर्मप्राँगण में आओ,
ना रहो,
हाथ पर हाथ धरे,
सपनों की क्या बात करें...

विगतागत को साथ लिए सब, 
किसी शत्रु से नहीं डरो अब, 
विजय करो तुम,
ताकि रहें सब,
खुशहाली के पात हरे,
सपनों की क्या बात करें...

हर क्षण जीवन का, एकांकी,
पल भर की बस मिथ्या झांकी, 
तब जियें मृत्यु तक,
ऐसे हम, 
कि हर क्षण हों आभार भरें,
सपनों की क्या बात करें...



नियति = Destiny 
अवनति=  Regress 
असिधार= Blade of sword 
कर्मप्राँगण= Field of  activities  (figurative )
विगतागत= Past & future
शत्रु= Enemy
मिथ्या= False
झांकी= Glimpse
मृत्यु= Death
आभार= Gratitude 


{ २००९  में लिखी मेरी कविताओं में से एक}

शनिवार, 7 नवंबर 2015

"इतना क्या उदास होना"


इतना क्या 
उदास होना;

ये लम्बे रास्ते  हैं, 
हैं मगर कुछ दूर तक ही, 
उम्र को यूँ अज़ल तक ढोना नहीं है, 
हर कुछ, तपे जो आग में, सोना नहीं है।  

यूँ पूरी किसी की होती नहीं हैं तमन्नायें,
इत्तिफ़ाक़न नहीं है ये ज़िन्दगी में 
काश होना; 
इतना क्या 
उदास होना; 

समझ के इन रास्तों पर,
क्या चले कोई, 
किनारों पर, कदम पर हर,
त-अज़्ज़ुब के शज़र हैं;

संजीदगी की जिंदगी के 
जिंदगी भर मायने क्या 
अपना यहाँ, जब एक भी कोना नहीं है 
जो होना था नहीं, होना नहीं है।  

ये  दुनिया है सराबों की, 
क्या हुआ जो तकलीफ देता है किसी से 
आस होना; 
इतना क्या 
उदास होना; 

करें किन रास्तों  का ज़िक्र,
कोई तो कहीं जाता नहीं,  
न  जाने किन मक़ामों की
ये दिल को आरज़ू सी है;

बड़े सहमे से, सिमटे से 
समेटे हैं खुदी को,
कुछ पा लिया है  क्या, कि जो खोना नहीं है  
किसी का भी ये तख़्त-ओ-ताज़ तो होना नहीं है। 

ये दरिया के किनारे भी, 
जो सूखे हैं  हलक, तो जानते हैं हम,
कि होता क्या है, 
प्यास होना; 
इतना क्या 
उदास होना;

हमें मालूम है जो आज पाते  हैं, 
वो खोना ही है आखिर 
हमें तो शौक है ये बस 
बनाने का, मिटाने का;

हम अपनी ही शमाँ से 
अपना ज़ाज़िब घर जलाते हैं, 
हमें  आतिश-जनों  में आग को बोना नहीं है  
ये हमने ठान रखा है कि बस रोना नहीं है। 

जो होना है तो बस इतना,
'उसी' की हाज़िरजवाबी का 
जवाब होना;
इतना क्या 
उदास होना।